Munawwar Rana Shayari in Hindi

मेरे दिल की हालत भी मेरे वतन जैसी है
जिस को दी हुकूमत, उसी ने बर्बाद किया


मिटा दिया उनका वजूद जो भी इनसे भिड़ा है
देश की रक्षा का संकल्प लिए, जो जवान सरहद पर खड़ा है


माँ के आगे यूँ कभी खुल कर नहीं रोना
जहाँ बुनियाद हो इतनी नमी अच्छी नहीं होती


बुज़ुर्गों का मेरे दिल से अभी तक डर नहीं जाता
कि जब तक जागती रहती है माँ मैं घर नहीं जाता


एक आँसू भी हुकूमत के लिए ख़तरा है
तुम ने देखा नहीं आँखों का समुंदर होना


दिया है माँ ने मुझे दूध भी वज़ू करके
महाज़े-जंग से मैं लौट कर न जाऊँगा


चाहता हूँ कोई नेक काम हो जाए
मेरी हर साँस इस देश के नाम हो जाए


तमाम जिस्म को आँखें बना के राह तको
तमाम खेल मोहब्बत में इंतिज़ार का है


कतरा-कतरा भी दिया वतन के वास्ते
एक बूँद तक ना बचाई इस तन के वास्ते
यूं तो मरते है लाखो लोग रोज
पर मरना वो है दोस्तों जो जान जाये वतन के वास्ते


ये हिज्र का रस्ता है ढलानें नहीं होतीं
सहरा में चराग़ों की दुकानें नहीं होतीं


जब भी देखा मेरे किरदार पे धब्बा कोई
देर तक बैठ के तन्हाई में रोया कोई


वतन की खाक को चंदन समझकर सर पे रखतें है
कब्र में भी खाके वतन कफन पे रखते हैं


अभी ज़िंदा है माँ मेरी मुझे कुछ भी नहीं होगा
मैं घर से जब निकलता हूँ दुआ भी साथ चलती है


अभी ज़िन्दा है माँ मेरी मुझे कु्छ भी नहीं होगा
मैं जब घर से निकलता हूँ दुआ भी साथ चलती है


दुआएँ माँ की पहुँचाने को मीलों मील जाती हैं
कि जब परदेस जाने के लिए बेटा निकलता है


बहन का प्यार माँ की ममता दो चीखती आँखें
यही तोहफ़े थे वो जिनको मैं अक्सर याद करता था


जलते भी गये कहते भी गये आजादी के परवाने
जीना तो उसी का जीना है, जो मरना वतन पर जाने


तुम्हारी आँखों की तौहीन है ज़रा सोचो
तुम्हारा चाहने वाला शराब पीता है


लबों पे उसके कभी बद्दुआ नहीं होती
बस एक माँ है जो मुझसे ख़फ़ा नहीं होती


बरबाद कर दिया हमें परदेस ने मगर
माँ सबसे कह रही है कि बेटा मज़े में है


अब दो ही बात होगी, मुहब्बत से पहले माँ
और माँ से पहले वतन की बात होगी


आन देश की शान देश की, देश की हम संतान हैं
तीन रंगों से रंगा तिरंगा, अपनी ये पहचान हैं


चलो चलते हैं मिलजुल कर वतन पर जान देते हैं
बहुत आसान है कमरे में वंदेमातरम कहना


वो बिछड़ कर भी कहाँ मुझ से जुदा होता है
रेत पर ओस से इक नाम लिखा होता है
मैं भुलाना भी नहीं चाहता इस को लेकिन
मुस्तक़िल ज़ख़्म का रहना भी बुरा होता है


मेरे ख्याल मे कोई ख्वाब नही बाकी
जिस्म वो ही है मगर अंदाज नही बाकी
आओ छोड़ दो मूझे कुछ पल के लिए तन्हा
के मेरे अंदर अब खूूशबू वो नही बाकी


शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले
वतन पर मरने वालों का बाकी यही निशां होगा


कभी ख़ुशी से ख़ुशी की तरफ़ नहीं देखा
तुम्हारे बाद किसी की तरफ़ नहीं देखा


ये सर-बुलंद होते ही शाने से कट गया
मैं मोहतरम हुआ तो ज़माने से कट गया
उस पेड़ से किसी को शिकायत न थी मगर
ये पेड़ सिर्फ़ बीच में आने से कट गया
वर्ना वही उजाड़ हवेली सी ज़िंदगी
तुम आ गए तो वक़्त ठिकाने से कट गया


हम अपने खून से लिखेंगे कहानी ऐ वतन मेरे
करे कुर्बान हंस कर ये जवानी ऐ वतन मेरे
दिली ख्वाहिश नहीं कोई मगर ये इल्तजा बस है
हमारे हौसले पा जाये मानी ऐ वतन मेरे


तुम्हें भी नींद सी आने लगी है थक गए हम भी
चलो हम आज ये क़िस्सा अधूरा छोड़ देते हैं