Munawwar Rana Shayari in Hindi

मैंने रोते हुए पोंछे थे किसी दिन आँसू मुद्दतों माँ ने नहीं धोया दुपट्टा अपना.


पगली तेरी याद तो बहुत आती है मगर वतन की मोहब्बत में दम ज्यादा है.


मेरे चेहरे पे ममता की फ़रावानी चमकती है मैं बूढ़ा हो रहा हूँ फिर भी पेशानी चमकती है.


किसी के ज़ख़्म पर चाहत से पट्टी कौन बाँधेगा अगर बहनें नहीं होंगी तो राखी कौन बाँधेगा.


मेरे हौंसले न तोड़ पाओगे तुम क्योंकि मेरी शहादत ही अब मेरा धर्म है सीमा पे डटकर खड़ा हूं, क्योंकि ये मेरा वतन है.


हाँ, मैं इस देश का वासी हूँ इस माटी का कर्ज चुकाऊंगा जीने का दम रखता हूँ तो इसके लिए मरकर भी दिखलाऊंगा.


चलो चलते हैं मिलजुल कर वतन पर जान देते हैं बहुत आसान है कमरे में वंदेमातरम कहना.


मेरे ख्याल मे कोई ख्वाब नही बाकी जिस्म वो ही है मगर अंदाज नही बाकी आओ छोड़ दो मूझे कुछ पल के लिए तन्हा के मेरे अंदर अब खूूशबू वो नही बाकी.


शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले वतन पर मरने वालों का बाकी यही निशां होगा.


मिट्टी में मिला दे कि जुदा हो नहीं सकता अब इस से ज़यादा मैं तेरा हो नहीं सकता.


वो बिछड़ कर भी कहाँ मुझ से जुदा होता है रेत पर ओस से इक नाम लिखा होता है मैं भुलाना भी नहीं चाहता इस को लेकिन मुस्तक़िल ज़ख़्म का रहना भी बुरा होता है.


कभी ख़ुशी से ख़ुशी की तरफ़ नहीं देखा तुम्हारे बाद किसी की तरफ़ नहीं देखा.


वतन की खाक को चंदन समझकर सर पे रखतें है कब्र में भी खाके वतन कफन पे रखते हैं.


दावर-ए-हश्र तुझे मेरी इबादत की कसम ये मेरा नाम-ए-आमाल इज़ाफी होगा नेकियां गिनने की नौबत ही नहीं आएगी मैंने जो मां पर लिक्खा है, वही काफी होगा.


अभी ज़िन्दा है माँ मेरी मुझे कु्छ भी नहीं होगा मैं जब घर से निकलता हूँ दुआ भी साथ चलती है.