Mirza Ghalib Shayari in Hindi

Bus ke hooN ‘GHalib’ aseeree meiN bhee aatish zer-e-pa,
Moo-e-aatish_deeda hai halqa meree zanjeer ka


Aata hai daagh-e-hasrat-e-dil ka shumaar yaadi
Mujh se mire gunah ka hisaab ai khuda Na maang


वो आए घर में हमारे, खुदा की क़ुदरत हैं!,
कभी हम उमको, कभी अपने घर को देखते हैं


दिल से तेरी निगाह जिगर तक उतर गई ,
दोनों को एक अदा में रजामंद कर गई,
मारा ज़माने ने ‘ग़ालिब’ तुम को ,
वो वलवले कहाँ , वो जवानी किधर गई


वो मेरा प्यार, तलब और मेरा चैन -ओ -क़रार ,
जफ़ा की हद में ज़माने का हो चूका होगा ,,
तुम उसकी राह न देखो वो ग़ैर था साक़ी ,
भुला दो उसको वो ग़ैरों का हो चूका होगा


कितने शिरीन हैं तेरे लब के रक़ीब ,
गालियां खा के बेमज़ा न हुआ ,
कुछ तो पढ़िए की लोग कहते हैं ,
आज ‘ग़ालिब ‘ गजलसारा न हुआ


इश्क़ मुझको नहीं वेहशत ही सही ,
मेरी वेहशत तेरी शोहरत ही सही ,
कटा कीजिए न तालुक हम से ,
कुछ नहीं है तो अदावत ही सही


सबने पहना था बड़े शौक से कागज़ का लिबास ,
जिस कदर लोग थे बारिश में नहाने वाले ,
अदल के तुम न हमे आस दिलाओ ,
क़त्ल हो जाते हैं , ज़ंज़ीर हिलाने वाले


सादगी पर उस के मर जाने की  हसरत दिल में है ,
बस नहीं चलता की फिर खंजर काफ-ऐ-क़ातिल में है ,
देखना तक़रीर के लज़्ज़त की जो उसने कहा ,
मैंने यह जाना की गोया यह भी मेरे दिल में है


फिर तेरे कूचे को जाता है ख्याल ,
दिल -ऐ -ग़म गुस्ताख़ मगर याद आया ,
कोई वीरानी सी वीरानी है .
दश्त को देख के घर याद आया


नज़र लगे न कहीं उसके दस्त-ओ-बाज़ू को,
ये लोग क्यूँ मेरे ज़ख़्मे जिगर को देखते हैं,
तेरे ज़वाहिरे तर्फ़े कुल को क्या देखें,
हम औजे तअले लाल-ओ-गुहर को देखते हैं


रही न ताक़त-ए-गुफ़्तार और अगर हो भी,
तो किस उम्मीद पे कहिये के आरज़ू क्या है,
बना है शह का मुसाहिब, फिरे है इतराता,
वगर्ना शहर में “ग़ालिब” की आबरू क्या है


तुम न आए तो क्या सहर न हुई,,
हाँ मगर चैन से बसर न हुई,
मेरा नाला सुना ज़माने ने,,
एक तुम हो जिसे ख़बर न हुई


गैर ले महफ़िल में बोसे जाम के ,
हम रहें यूँ तश्ना-ऐ-लब पैगाम के ,
खत लिखेंगे गरचे मतलब कुछ न हो ,
हम तो आशिक़ हैं तुम्हारे नाम के ,
इश्क़ ने “ग़ालिब” निकम्मा कर दिया ,,
वरना हम भी आदमी थे काम के


बहुत सही गम -ऐ -गति शराब कम क्या है ,
गुलाम -ऐ-साक़ी -ऐ -कौसर हूँ मुझको गम क्या है
तुम्हारी तर्ज़ -ओ -रवीश जानते हैं हम क्या है
रक़ीब पर है अगर लुत्फ़ तो सितम क्या है
सुख में खमा -ऐ -ग़ालिब की आतशफशनि
यकीन है हमको भी लेकिन अब उस में दम क्या है


वफ़ा के ज़िक्र में ग़ालिब मुझे गुमाँ हुआ ,
वो दर्द इश्क़ वफाओं को खो चूका होगा ,,
जो मेरे साथ मोहब्बत में हद -ऐ -जूनून तक था ,
वो खुद को वक़्त के पानी से धो चूका होगा ,,
मेरी आवाज़ को जो साज़ कहा करता था ,
मेरी आहोँ को याद कर के सो चूका होगा