75+ Mir Taqi Mir Shayari in Hindi

Mir Taqi Mir Shayari in Hindi

गुफ़्तुगू रेख़्ते में हम से न कर
ये हमारी ज़बान है प्यारे


ले साँस भी आहिस्ता कि नाज़ुक है बहुत काम
आफ़ाक़ की इस कारगह-ए-शीशागरी का


उल्टी हो गईं सब तदबीरें कुछ न दवा ने काम किया
देखा इस बीमारी-ए-दिल ने आख़िर काम तमाम किया


कुछ करो फ़िक्र मुझ दीवाने की
धूम है फिर बहार आने की


अब जो इक हसरत-ए-जवानी है
उम्र-ए-रफ़्ता की ये निशानी है


Ab Tu Jate Hain But Kade Se Mir
Phir Milen Gey Agar Khuda Laya


ishq ik ‘mīr’ bhārī patthar hai
kab ye tujh nā-tavāñ se uThtā hai


जम गया ख़ूँ कफ़-ए-क़ातिल पे तिरा ‘मीर’ ज़ि-बस
उन ने रो रो दिया कल हाथ को धोते धोते


अश्क आँख में कब नहीं आता,
लहू आता है जब नहीं आता।


फूल गुल शम्स ओ क़मर सारे ही थे
पर हमें उन में तुम्हीं भाए बहुत


हम हुए तुम हुए कि ‘मीर’ हुए
उस की ज़ुल्फ़ों के सब असीर हुए


Ab Dekh Le Ke Sena Bhi Taza Hoya Hai Chak
Phir Ham Se Apna Hal Dikhaya Na Jaye Ga


सिरहाने ‘मीर’ के कोई न बोलो
अभी टुक रोते रोते सो गया है


अमीर-ज़ादों से दिल्ली के मत मिला कर मीर,
कि हम ग़रीब हुए हैं इन्हीं की दौलत से।


याद उस की इतनी ख़ूब नहीं ‘मीर’ बाज़ आ
नादान फिर वो जी से भुलाया न जाएगा


Yun Nakam Rahen Gey Kab Tak Ji Mein Hai Ik Kaam Karen
Ruswa Ho Kar Mar Jawain Us Ko Bhi Badnam Kren


Milne Ka Wa’ada Un Ke Tu Munh Se Nikal Gya
Pochi Jga Ju Mai Ne Tu Kha Hans Ke Khwab Main


किन नींदों अब तू सोती है ऐ चश्म-ए-गिर्या-नाक
मिज़्गाँ तो खोल शहर को सैलाब ले गया


लगा न दिल को क्या सुना नहीं तूने,
जो कुछ मीर का आशिकी ने हाल किया।


‘मीर’ के दीन-ओ-मज़हब को अब पूछते क्या हो उन ने तो
क़श्क़ा खींचा दैर में बैठा कब का तर्क इस्लाम किया


आग थे इब्तिदा-ए-इश्क़ में हम
अब जो हैं ख़ाक इंतिहा है ये

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