Mir Taqi Mir Shayari in Hindi

दिल की वीरानी का क्या मज़कूर है
ये नगर सौ मर्तबा लूटा गया


अब तो जाते हैं बुत-कदे से ‘मीर’
फिर मिलेंगे अगर ख़ुदा लाया


जब कि पहलू से यार उठता है,
दर्द बे-इख़्तियार उठता है।


रोते फिरते हैं सारी सारी रात
अब यही रोज़गार है अपना


हमारे आगे तिरा जब किसी ने नाम लिया,
दिल-ए-सितम-ज़दा को हम ने थाम थाम लिया।


Ishq Ik ‘Mir’ Bhari Pathar Hai
Kab Ye Tuj Naatwan Se Uthta Hai


इक़रार में कहाँ है इंकार की सी सूरत
होता है शौक़ ग़ालिब उस की नहीं नहीं पर


अहद-ए-जवानी रो रो काटा पीरी में लीं आँखें मूँद
यानी रात बहुत थे जागे सुब्ह हुई आराम किया


Bewafai Pey Teri Jee Hai Fida
Qahar Hota Jo Bawafa Hota


दिखाई दिए यूँ कि बे-ख़ुद किया
हमें आप से भी जुदा कर चले


ध के गोया पत्ती गुल की वो तरकीब बनाई है
रंग बदन का तब देखो जब चोली भीगे पसीने में


हम जानते तो इश्क़ न करते किसू के साथ
ले जाते दिल को ख़ाक में इस आरज़ू के साथ


Ab Kar Ke Faramosh Tu Nashad Karo Gey
Par Ham Jo Na Hon Gey Tu Bohat Yaad Karo Gey


‘मीर’ उन नीम-बाज़ आँखों में
सारी मस्ती शराब की सी है


सख़्त काफ़िर था जिन ने पहले ‘मीर’
मज़हब-ए-इश्क़ इख़्तियार किया


कुछ नहीं सूझता हमें उस बिन
शौक़ ने हम को बे-हवास किया


पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है
जाने न जाने गुल ही न जाने बाग़ तो सारा जाने है