Mir Taqi Mir Shayari in Hindi

अब कर के फ़रामोश तो नाशाद करोगे पर हम जो न होंगे तो बहुत याद करोगे.


Iqrar Mein Kahan Hai Inkar Ki Se Sorat  Hota Hai Shoq Ghalib Us Kin Ahi Nahi Par.


क्या कहूँ तुम से मैं कि क्या है इश्क़ जान का रोग है बला है इश्क़.


मिरे सलीक़े से मेरी निभी मोहब्बत में, तमाम उम्र मैं नाकामियों से काम लिया.


सुबह होती रही शाम होती रही उम्र यूँ ही तमाम होती रही.


अब तो जाते हैं बुत-कदे से ‘मीर’ फिर मिलेंगे अगर ख़ुदा लाया.


जब कि पहलू से यार उठता है, दर्द बे-इख़्तियार उठता है.


Wo Aaye Bazm Main Itna Tu Mir Ne Dekha Phir Is Ke Bad Chiraghon Main Roshni Na Rahi.


रोते फिरते हैं सारी सारी रात अब यही रोज़गार है अपना.


nāzukī us ke lab kī kyā kahiye pañkhuḌī ik gulāb kī sī hai.


बेवफ़ाई पे तेरी जी है फ़िदा क़हर होता जो बा-वफ़ा होता.


Ab Tu Jate Hain But Kade Se Mir Phir Milen Gey Agar Khuda Laya.


कहा मैं ने गुल का है कितना सबात कली ने ये सुन कर तबस्सुम किया.


yaad us kī itnī ḳhuub nahīñ ‘mīr’ baaz aa nādān phir vo jī se bhulāyā na.


जाए है जी नजात के ग़म में ऐसी जन्नत गई जहन्नम में.