Mir Taqi Mir Shayari in Hindi

कहते तो हो यूँ कहते यूँ कहते जो वो आता
ये कहने की बातें हैं कुछ भी न कहा जाता


कहा मैं ने गुल का है कितना सबात
कली ने ये सुन कर तबस्सुम किया


yaad us kī itnī ḳhuub nahīñ ‘mīr’ baaz aa
nādān phir vo jī se bhulāyā na


जाए है जी नजात के ग़म में
ऐसी जन्नत गई जहन्नम में


अमीर-ज़ादों से दिल्ली के मिल न ता-मक़्दूर
कि हम ग़रीब हुए हैं इन्हीं की दौलत से


ज़ख़्म झेले दाग़ भी खाए बहुत,
दिल लगा कर हम तो पछताए बहुत।


नाहक़ हम मजबूरों पर ये तोहमत है मुख़्तारी की
चाहते हैं सो आप करें हैं हम को अबस बदनाम किया
हमारे आगे तिरा जब किसू ने नाम लिया
दिल-ए-सितम-ज़दा को हम ने थाम थाम लिया


मत सहल हमें जानो फिरता है फ़लक बरसों
तब ख़ाक के पर्दे से इंसान निकलते हैं


क्या आज-कल से उस की ये बे-तवज्जोही है
मुँह उन ने इस तरफ़ से फेरा है ‘मीर कब का


शर्त सलीक़ा है हर इक अम्र में
ऐब भी करने को हुनर चाहिए


Bulbul Ghazal Sarai Aage Hamare Mat Kar
Sab Ham Se Sekhte Hain Andaz Guftagu Ka


Pata Pata Bota Bota Haal Hmara Jaane Hai
Jaane Na Jaane Gul Hi Na Jaane Bagh Tu Sara Jaane Hai


दिल्ली में आज भीख भी मिलती नहीं उन्हें
था कल तलक दिमाग़ जिन्हें ताज-ओ-तख़्त का


अब तो जाते हैं बुत-कदे से ‘मीर’
फिर मिलेंगे अगर ख़ुदा लाया


Wo Aaye Bazm Main Itna Tu Mir Ne Dekha
Phir Is Ke Bad Chiraghon Main Roshni Na Rahi


nāzukī us ke lab kī kyā kahiye
pañkhuḌī ik gulāb kī sī hai


बेवफ़ाई पे तेरी जी है फ़िदा
क़हर होता जो बा-वफ़ा होता


रात हैरान हूं, कुछ चुप ही मुझे लग गयी मीर
दर्द-ए-पिन्हां थे बहुत, पर लब-ए-इज़हार न था


कासा-ए-चश्म ले के जूँ नर्गिस
हम ने दीदार की गदाई की