Mir Taqi Mir Shayari in Hindi

क्या आज-कल से उस की ये बे-तवज्जोही है मुँह उन ने इस तरफ़ से फेरा है ‘मीर कब का.


शर्त सलीक़ा है हर इक अम्र में ऐब भी करने को हुनर चाहिए.


Bulbul Ghazal Sarai Aage Hamare Mat Kar Sab Ham Se Sekhte Hain Andaz Guftagu Ka.


दिल्ली में आज भीख भी मिलती नहीं उन्हें था कल तलक दिमाग़ जिन्हें ताज-ओ-तख़्त का.


अहद-ए-जवानी रो रो काटा पीरी में लीं आँखें मूँद यानी रात बहुत थे जागे सुब्ह हुई आराम किया.


Bewafai Pey Teri Jee Hai Fida Qahar Hota Jo Bawafa Hota.


दिखाई दिए यूँ कि बे-ख़ुद किया हमें आप से भी जुदा कर चले.


ध के गोया पत्ती गुल की वो तरकीब बनाई है रंग बदन का तब देखो जब चोली भीगे पसीने में.


सख़्त काफ़िर था जिन ने पहले ‘मीर’ मज़हब-ए-इश्क़ इख़्तियार किया.


ले साँस भी आहिस्ता कि नाज़ुक है बहुत काम आफ़ाक़ की इस कारगह-ए-शीशागरी का.


अश्क आँख में कब नहीं आता, लहू आता है जब नहीं आता.


Pata Pata Bota Bota Haal Hmara Jaane Hai Jaane Na Jaane Gul Hi Na Jaane Bagh Tu Sara Jaane Hai.


सिरहाने ‘मीर’ के कोई न बोलो अभी टुक रोते रोते सो गया है.


चश्म हो तो आईना-ख़ाना है दहर मुँह नज़र आता है दीवारों के बीच.


Phirte Hai Mir Khwar Koi Pochta Hi Nahi Is Aashqi Main Tu Izat Saadat Bi Gayi.